Wednesday, September 21, 2011

मेरी अभिलाषा




सोचती हू कि आखिर क्या है जीवन की परिभाषा,
कब और कैसे समझ पाऊंगी मैं इसकी भाषा.....
वो ईश्वर ही है, जिसने हम सबको है बनाया,
पर इंसान अब तक उसकी महिमा जान न पाया।
                     आज मेरे दिल में एक ख्याल आया,
                     खुद को जानने का एक विचार आया......
                     मै कौन हूं, अपने को पहचानूं,
                     अपने इस जीवन के उद्देश्य को जानूं।
जितना जानने की कोशिश करती उतना ही खो जाती,
पर अपने इस जीवन के मर्म को जान न पाती.....
जितना अब तक जाना, उससे यह विश्वास पाया है,
बिन तुम्हारी कृपा के कुछ नहीं हो पाया है।
                     अब तो हर पल बस एक ही आजमाइश है,
                     तुम्हें सिर्फ तुम्हें पाने की ख्वाहिश है।
                     क्या जाने कब पूरी होगी मेरी अभिलाशा,
                     इसकी खातिर ही तो है मुझे जीने की आशा।

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